Monday, November 22, 2010

Nothing personal strictly Business (poetical)!

ईश्वर कि कृपा भगवान की दया, अल्लाह की मेहरबानी है
जो भी है जैसी भी है अपनी बस - यही कहानी है

दिल के जज़्बात लबों पर आते आते रुक जातें हैं
विचार नहीं थमते पर शब्द खत्म हो जाते हैं
मेरे बीते दिन बस यही सवाल दोहराते हैं
लाख कोशिशों से भी जिनके उत्तर नहीं मिल पाते हैं...

किसी से दिल लगाने की ऐसी सज़ा क्यों मिलती है?
सच्चा प्यार नहीं मिलता- फरेबी बहुत मिल जाते हैं!

विश्वास होता है जिनपे अधिक वे ही विश्वासघात कर जाते हैं
उम्मीद कर के वफाई की, पर धोके पे धोके खाते हैं।
दिल को देकर दर्द, उस दर्द को और बढ़ाते हैं...
आज के ये प्रेमी कुछ ऐसी प्रीत निभाते हैं।

हे ईश्वर! करता हूँ मैं तुझसे करबद्ध प्रार्थना! पूर्ण कर मेरी ये मनोकामना-
मुझे जो मिला ऐसा यार किसे ना देना... ऐसा ज़ालिम प्रीत ऐसा गद्दार किसे ना देना।

मैं सह गया ये गम, हर कोई सह ना पायेगा...
प्रेमियों का प्रेम सी विश्वास ही उठ जाएगा।
है खबर तुझे - बिन प्रेम संसार नष्ट हो जाएगा।
तड़प उठेगी धरती, ये आकाश भी फट जाएगा!

अपनी रचना का ऐसे हाल... क्या तू सह पायेगा?
क्या मेरी तरह, तू नहीं तड़पेगा? पछताएगा??

माफ़ करना जो मैं तुझसे प्रश्न कर रहा हूँ
क्या करूँ? इंसान हूँ तभी ये भूल कर रहा हूँ!
जो कर रहा हूँ, मजबूर होकर कर रहा हूँ...
हूँ तो मैं जीवित पर अन्दर ही अन्दर मर रहा हूँ!

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