Monday, October 5, 2015

Aasthik Geeta - (Part 1)

Most Sanskrit words do not have their exact translations. The closest word in English that comes close to describing "Geeta" is 'Song'. Hence Krishna's message to Arjuna is actually a Song which Universe sings. It was composed by Maha Rishi Vyas in Sanskrit. Since most of us, today, do not understand Sanskrit, I am embarking on a challenging journey to re-write Geeta, in parts - poems actually - the Aasthik way. I know I can't really replicate the work of Maha Rishi Vyas, but its a try nonetheless. I invite scholars and people at large, to let me know my mistakes.

Following is the Aasthik's Understanding of Geeta-

मैं केवल एक भक्त हूँ, क्या ही गीता दोहराऊंगा  ?
कुछ भी तो ऐसा नहीं , जिसे नया मैं कह पाँऊगा !

किन्तु प्रयत्न है यह मेरा, आधुनिक भाषा में कह जाऊँ
कलयुग के मानवों को, गीता का अर्थ मैं बतलाऊँ

आज, क्या है गीता का महत्व? क्या है उसका उपयोग?
क्या है ज्ञान-यज्ञ? क्या है धर्म?, और क्या है कर्म योग?

जितनी मेरी बुद्धि है, जितनी है मेरी छमता
जितना मेरा पांडित्य है, जितना मुझसे है बनता

हर प्रयास, हर प्रयत्न , हर कोशिश मैं कर जाऊँगा
प्रज्ञता मेरी है जितनी भी, तुमको उतना समझाऊंगा

अर्जुन है दुविधा में, रणभूमि में परेशान खड़ा
सोच रहा है आज वह, क्यों ही है ये युद्ध छिड़ा ?

योद्धा तो कई हैं किन्तु, केवल अर्जुन ही ये सोच रहा...
भूमि के कुछ टुकड़ों के लिए, यह महायुद्ध क्यों हो रहा ?

कृष्ण तो सर्वज्ञ हैं, मंद-मंद मुस्काते है
अर्जुन की व्यथा  देख, वे कुछ ऐसा कह जाते हैं-

"हे निष्पाप अर्जुन बताओ मुझे - क्या है तुम्हारी दुविधा ?
ग्लानिर्मुख हो आज क्यों , रहते तुम हँसमुख सदा ?"

अर्जुन कहे -
"हे माधव! युद्धभूमि में, आज जो हूँ मैं खड़ा"
"दिख रही है आज मुझे, मानवता की पीड़ा"

"क्यों करते हैं युद्ध हम, जब दोनों ओर हैं अपने ?"
"क्या अपनों को मार कर, पूरे  होंगे सबके सपने ?"

"स्वर्ग मिल जाये मुझे, तब भी माधव, क्या मैं ये सह पाउँगा?"
"पितामह, गुरुद्रोण का वध कर, खुदसे कैसे नज़रें मिलाऊंगा?"

"हे केशव! रथ के साथ आज तुम, मेरे सार्थी बन जाओ"
"भ्रमित है आज मन मेरा, कृपया मार्ग मुझे आप बतलाओ!"

"क्या करना है मुझको अब? क्या है मेरा धर्म ?"
"क्या मेरा कर्त्तव्य है? और कैसा हो मेरा कर्म?

कृष्ण कहें-
"हे अर्जुन! यह कुरुक्षेत्र है तुम्हारी कर्म-भूमि!"
"ना यह युद्ध है बदले का, न ही है जंग-ए-भूमि"

"बदले की आग में इंसान, स्वयं ही जल जाता है"
"ऐसे कर्मों  से भला, कहाँ कोई मुक्ति पाता है?"


"द्रौपदी वस्त्रहरण नहीं पार्थ, तुम्हारी व्यक्तिगत समस्या"
"यह तो है नारीत्व व मानवता की, है ये धर्म की निर्मम हत्या!"

"जो समाज अपने पटरानी की, लाज बचा ना पाये..."
"आम-स्त्री के रक्षा की, उससे क्या ही आशा की जाए?"

"हे धनन्जय! इसलिए कहता हूँ, अपना 'गांडीव' उठाओ!"
"लेकर नाम परमेश्वर का, तुम यह धर्मयुद्ध लड़ जाओ!" 

[To be continued in Part-2]

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