Sunday, December 20, 2015

Aasthik's Surrender.

आज जो लिखना चाहता हूँ, शायद ही लिख पाउँ
इन सिमित शब्दों से मैं, कैसे तुम्हें समझाऊं?


असमंजस में है दिल मेरा, रूह भी लाचार है 
फिर भी कोशिश है मेरी, हाल-ए-दिल तुम्हें सुनाऊँ  




पूछती हो तुम अक्सर, क्यों मुझे तुमसे प्यार है?
वजह जब हो रिश्तों में, वो प्यार नहीं व्यापार है!


जिस दिन वजह होगी, प्यार-प्यार न रह जायेगा 
ऐसा प्यार तोह वजह के साथ ही मर जायेगा


हाँ कुछ बातें है तेरी, जो मेरे दिल को भाति है
मदिरा की तरह ये मेरे रूह में उतर जाती हैं 


तेरी सादगी, तेरा बचपना, और तेरा वो इठलाना
वक़्त-वक़्त पे वो तेरा, आँखों से प्यार जताना





भूल कर बंधन सारे, तेरा मुझसे मिलने आना
और छोटी-छोटी बातों पे, तेरा वो नखरे दिखाना  

जीवन में पहली बार मेरे, ऐसा कुछ है हो रहा
गंधर्व, माया, जलपरी या तू है कोई अप्सरा?


मीलों दूर है तू मुझसे, फिर भी तू मेरे पास है
मेरे रूह के हर हिस्से को हर पल तेरा एहसास है!


नींद नहीं मेरी आँखों में, तन्हाई में मुस्कुराता हूँ,
कविताएं  लिखता हूँ कभी, कभी नग्में गुनगुनाता हूँ. 




सोच रहा मैं इन दिनों, तूने मुझपे, ये कैसा जादू चलाया है?
साधक था अब तक जो आस्तिक, उसे तूने आशिक़ बनाया है!


झुका जो सिर्फ मातृभूमि, गुरु और ईश के लिए
प्यारी अपनी बातों से, तूने उसे भी झुकाया है


कैसे बयान करूँ वो अजूबा, जो तूने कर दिखाया है?
प्यार के इज़हार में ये आशिक़ भी घुटनों पे आया है!





आज तेरे आगे ये आस्तिक आत्म-समर्पण करने आया है 
अब तू.. अपना ले या ठुकरा दे, मैंने तो प्यार निभाया है. 

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